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इतना बेहोश मैं, अनजान बनके आया हूं;
मेरे घरमें ही यूँ मेहमान बनके आया हूं !
सितार-तारकी तरह खिंचा-खिंचाके मैं,
सारेगमसे भी ऊंची तान बनके आया हूं.
समयके इतने किये हैं मैने अपमान सहन,-
एक-दो शब्द-सुरका मान बनके आया हूं.
तुम्हारे लफ्ज-दीदारोंके यहां ढेर करो,
मैं यहां सिर्फ आंख-कान बनके आया हूं.
छिड़कदो मुझपे यहांकी हरेक नदीका जल,
मैंतो इतना यहां वीरान बनके आया हू!
तुम्हारी यादने तो काव्य, सुर सिखाये हैं,
गुरु-दातव्यका एक गान बनके आया हूं.
क्युंकि 'ठक्कर' तो बह गया है दिलकी बाढोंमें,
सिर्फ एक शुध्ध मैं 'घनश्याम' बनके आया हूं
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1993
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Music: Oasis Thacker Instrumental Music |
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संगीतः घनश्याम ठक्कर |
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संगीतः घनश्याम ठक्कर |
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कवि घनश्याम ठक्कर |
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कवि घनश्याम ठक्कर |
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कवि घनश्याम ठक्कर |