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कवि घनश्याम ठक्कर गुजराती काव्यसंग्रह |
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कवि घनश्याम ठक्कर गुजराती काव्यसंग्रह |
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भूरी शाहीनां खळखळ
कवि घनश्याम ठक्कर गुजराती सीडी काव्यसंग्रह |
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(गझल)
भंवरा गलेपे सजाके वो गुंजन घूमता है
फूलोंके विज्ञापनका ये वाहन घूमताहै.
मेरी नशीली आंखोंमें तेरा टहलना था ऐसेः
कुहरेकी गलियोंमें जैसे कि उपवन घूमता है.
बंधा हुआ है जो गांठसे लाल धागोंकी मंगल,
शोणितसे मिलजुल सांसोका बंधन घूमताहै.
मेरी गलीमें तेरी वो आवन-जावन थी ऐसी,
जैसे खजांचीचीके हाथोंमें से धन घूमता है.
पतझडकी मौसममें पेडोंने अपने कपडे गंवाये,
जैसे हवाके किनारे पे मोहन घूमता है!
चक्कर-भ्रमण बाद रुकने पे भी मन घूमता है...
वैसे ही 'घनश्याम'के बीच जीवन घूमता है!