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कलापीकेतन - घनश्याम ठक्कर
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प्यारे दोस्तो

रास डांडियाके साथ खेला जाता है, तो गरबा हाथकी तालीके साथ. गरबाके अलग अलग प्रकार होते है, तीन ताली, दो ताली इत्यादी. डांडिया पुरुष-स्त्री साथ-साथ खेलतें हैं, गरबा ज्यादातर सिर्फ लडकियों और औरतें खेलती है. हींच एक अनोखा और धमाकेदार गरबा है, जिसमें न तो डांडियाकी जरूरत है, न तो तालीकी. वैसे तो हींचमें भी सब चक्करमें घूमते हैं, लेकीन नृत्य अलग होता है. गुजरातीमें हींचनेका मतलब झूलेपे झूलना. इस नृत्यमें लोग उछलनेसे ज्यादा झूमते हैं, और झूमनेसे ज्यादा उछलते हैं. और क्यों नहीं? हींचके ढोलकी रीधम, वाजिंत्रोंके सूरकी रीधम और शब्दके ध्वनीकी रीधम सिर्फ यही कहती है , 'उछलो, झूंमो, नाचो'.  

हर नर्तक-नर्तकी फ्री-स्टाईल न्रृत्यमे अपनी एकताई दिखाते हैं. शरीरका हर अंग नृत्य करता है.  पांव उछलते है, कमर लचकती है, हाथ जीमें आये ऐसी अदा करते हैं, और चहरेसे उमंगोंकी बौछार होती है! हाथके एक प्रचलित ढंगमें एक हाथकी कुहनीको दूसरे हाथकी हथेलीमें टकराकर नृत्यकी अदा बनायी जाती है.

१९७७के अरसेमें जब अमरिकाके डालास-फोर्टवर्थ विस्तारमें रहता था, तब हॉबीके लिय ड्रमसेट (जो आपको फोटोमें दीख रहा हे) ले लिया था. जॉब परसे घर आनेके बाद रिलेक्सेशनके लिये, अमरिकन या हिन्दी गीतोंकी कसेट लगाकर ड्रम पर प्रेक्टिस करता.

उस समय डालासमें भारतियोंकी आबादी बहुत कम थी, फिर भी नवरात्रीके समय डांडियारासके कार्यक्रमोंमें काफी भीड लग जाती थी. ११९०के बाद लोग डांडियारास और अन्य डान्स करनेमें शरमाते नहीं है, लेकिन उस समय बहुत सारे गुजराती डांस फ्लोर पर काफी लजीले रहते थे. बहुत कम लोग डांडियारास खेलनेके इरादेसे आते थे. कुछ लोग बच्चोंके लिये आते थे, और कुछ दोस्तोंसे मिलनेको. आगंतुकोंमेंसे २५% लोग रास खेलते, बाकीके सब प्रेक्षक! और एक तकलिफ थी. इलाकेमें एक-दो कलाकार तवला बजाते थे, मैं छोटासा ढोलक और बांगो बजाता था, लेकिन कोई ढोल नहीं बजाता था. और, वो मेहमान जो 'To dance or not to dance'के विकल्पसे परेशान थे, उन्को जोश देने वाला ढोल नहीं था.

अब तक भारतमें या बिदेसमें किसीने डांडियारास्में ड्रमसेट नहीं बजाया था. एक नवरात्रीकी रातको में पूरा ड्रमसेट ले कर गया. ड्रमसेटका दृश्य ही 'पार्टी-पार्टी'की पुकार करता है.  में ड्रमसेट एसेम्बल ही कर रहा था, कि बच्चे और टीनएजर, कॅन्डीमेनकी आसपास इकठ्ठे हो जाय, इस तरहसे उत्साहमें आ गये, और मेरे आसपास इकठ्ठे हो गये.

ड्रमकी आवाझ सुनते ही हॉलमें जोशका तुफान आ गया. जो लोग साईडलाईन पर बठे थे उनमेसे बहुत सारे डांस फ्लोर पर आ गये. रास खेलैयाकी संख्या २५%से बढकर, करीब ६०% हो गई.

एक दो दिनके बाद जब घरमें कसेटके साथ प्रेक्टीस कर रहे थे, तब कसेट पर मैने एक हींच - गरबा सुना. मुझे च्वेष आ गया. मैंने उस रातके डांडियारासके कार्यक्रमके लिये गायककी साथ हींच तैयार किया. बेझ-ड्रम और अलग अलग टोम-टोमका संयोजन करके ढोलका ध्वनि बनाया. रातको जब हींचकी रीधम शुरू हुई, तो खेलैयाके पांव हिरनके पांव बन गये, और लोग उची उंची फलांग लगाके हींच गरबा करने लगे. एक मिनिटमें बेंच बैठा हुआ कोई नहीं था. सब नाच रहे थे.

आशा है, यह हींच सुनकर आपको भी जोश आ जायेगा.

 

 

 

 

                                                                                                                                                       

 

 

 

 

 

 

 

 

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घनश्याम ठक्कर ड्र्मसेट पर (१९८५?)

 

ओ राज रे (हींच - गरबा)
टाइटल सोंग
संगीतः: घनश्याम ठक्कर :: गीतः लोकगीत और घनश्याम ठक्कर
स्वरः जयश्री भोजविया और साथी

 

यह गीत निर्धारित समयके लिये प्रसारित किया गया था. उसका कुछ समयके बाद फिरसे प्रसारण होगा.

 
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