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प्यारे दोस्तो
इस लोकगीतमें बात है दो प्रेमी, (पति-पत्नि)की. नवरात्रीका समय है, और पतिदेव पूरी रात घर नहीं आते है. देवीजी को यह संशय है कि उसका बांका छैला कुछ कंवारी छैलियोंके साथ रातभर डांडिया-रास खेलकर आया है! सुबहमें प्रियतम घर आते हैं तो स्पष्टतः प्रियतमाको कुछ प्रश्न है. लेकीन वह डंडा ले कर पुलिसकी तरह नहीं पूछती है, "Where the hell have you been all night, you son of a squirrel?" उसके बदलेमे प्यारे प्रोसीक्युटरकी तरह 'रंगरसिया' जैसा रंगीला संबोधन लगाकर पूछती है, "ओ.. रंगर्सिया, कहां गया था रातभर रास खेलनेको? ये जागरणसे भरी लाल अंखियां क्युं?" लेकिन प्रियतमभी बेवकुफ नहीं है, एक चालाक डिफेंडेंटकी तरह जेबमेंसे सोनेके पैंजनेकी जोड निकालके कहता है, 'अरे पगली, मैतो देर रात तक सुनारके यहां था, तेरे लिये ये कस्टम-मेइड झांझर बनवानेमें कमबख्त सुबहा हो गई." लेकिन प्रोसिक्युटर प्रियतमाको अभी ऐतबार नही होता है. वह फिरसे यही प्रश्न पूछती है. पतिदेव दूसरी जेबमेंसे चूडियां निकालकर कहता है, " अरी, मैं तो चूडियां बनानेवालेके यहां भी गया था. इतनी सुंदर चूडियां बनानेमें सुबह हो गई!!"
मेरे ब्लोगके महार्थक मेहमान! अब फैंसला आपके हाथमें है. कॉमेंट विभागमें जवाब लिखिये किः
१. क्या ये प्रियतम सच कह रहा है, कि उसने पूरी रात पत्नीके लिये गहने बनवानेके लिये बितायी?
२. या वह सचमुच गोरीयोंके साथ रास खेलने गया था, और बहाने + रिश्वतके लिये गहने पहलेसे बनवाकर रख्खे थे?
कोमेंट विभागमें जवाब लिखिये.
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कवि घनश्याम ठक्कर गुजराती काव्यसंग्रह |
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कवि घनश्याम ठक्कर गुजराती काव्यसंग्रह |
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भूरी शाहीनां खळखळ
कवि घनश्याम ठक्कर गुजराती सीडी काव्यसंग्रह |

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ओ रंग-रसिया |
डांडिया रास |
संगीतः: घनश्याम ठक्कर |
गीतः लोकगीत |
स्वरः किशोर मनराजा, दमयंती बरडाई, और साथी |
