श्यामल! अब घिर घिरके न आओ - घनश्याम ठक्कर
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मेरी आंखोसे बिजली गिरेगी रे, श्यामल! अब घिर घिरके न आओ
'सूरजकी आंखोमें काजल'-सा घिरना,
बस इतना बरसो कि में जलजलुं ना...
मैं तो छोटे गांवकी छोटी सी नदिया,
बस इतना बरसो कि में छलछलुं ना....
मेरी आहोंसे आंधी चढेगी रे, श्यामल! अब घिर घिरके न आओ
मेरी आंखोसे बिजली गिरेगी रे, श्यामल! अब घिर घिरके न आओ
ईंट-पथ्थरोंकी मनाई मेरे देसमें है,
फूलके है महोले, पंखडियों के घर है.
जमुना समज कर न हम पर बरसना,
राधा नहीं, - गुडियोंका ये नगर है!
मेरी नसनसमें बाढे चढेगी रे, श्यामल! अब घिर घिरके न आओ
मेरी आंखोसे बीजली गिरेगी रे, श्यामल! अब घिर घिरके न आओ
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1995
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